(दो)

आज गांव में जश्न का माहौल है होरी का त्योहार जो है कहीं पुआ - पुड़ी की तो कहीं गुजिए की महक कोई महुए के शुरूर में तो कोई ठंडई के गुुरूर में कोई गटक रहा ठर्रा तो कोई बुदका कोई गा रहा, कोई बजा रहा, तो कोई लगा रहा ठुमका अलमस्ती की हद तक

अपने दलान में साथियों के साथ पालथी मारकर बैठे झींगना के सिर पर फगुनाहट की आहट का अंदाजा साफ लगाया जा सकता है रंग से सरावोर, कपड़े फटे हुए और आंखे मदहोशी में

सुबह से हीं भांग खाके भकुआया है झींगना.... फगुनाहट सिर चढ़के बोल रही है कहता है झींगना -‘‘ बताओ बलराज भइया ! बियाह के बाद का पहिला फगुआ इम अइसे ही जाने देंगे का ?‘‘

‘‘अरे नाहीं झींगना ! दिन कवनो बार-बार थोडं़ो नऽ आता है जो गंवाई दोगे ‘‘

बीच में टपक पड़ा धनेसरा, बोला - ‘‘झींगना भइया आज मत जइयो घर छोड़कर खुब खेलियो होरी, खुब करियो वरजोरी भऊजाई के साथ ‘‘

‘‘हां, हुई लाख टके की बात ‘‘ झींगना ने चिहंुकते हुए कहा

तभी टोका - टोकी के बीच पान की पिक पीच्च से मारते हुए बलराज ने इशारा किया -‘‘झींगना, हो जाए जोगीरा सर .... ‘‘

‘‘हां, हां, काहे नाही बलराज भइया ! मगर पहिले ठंडई फेर जोगीरा.... ‘‘


झींगना की आवाज सुनकर सुरसतिया बटलोही में भरकर दे जाती है ठंडई और लोटा में पानी, कहती है - ‘‘जेतना पचे ओतने पीऽऽ लोगन, होरी में बखेरा करे के कवनो जरूरत नाहीं ‘‘

‘‘ठीक बा भऊजी ! जइसन तोहार हुकुम, लेकिन नाराज मत होअ आज के दिन।‘‘धनेसर ने कहा दांत निपोरते हुए मत होअ आज दिन ‘‘ कत्थई दांतो की मोटी मुस्कान और बेतरतीब मूछों कि थिरकन देख सुरसतिया साड़ी के पल्लु को मुुंह में दबाये घूंघट की ओट से मुसकाके देहरी के भीतर भागी

सभी ने एक - एक करके ठंडई गटकते हुए पान का बीड़ा दबाया मुंह में और ताल ठोककर शुरू - ‘‘जोगीरा झूम - झूम के आयो फागुन गांव / चल सन महुए बाली छांव, कि भइया होश में खेल होरीकर जिन केहु से बरजोरी देख फिसल जाए पांव.... जोगी जी धीरे - धीरे जतन से धीरे - धीरे, मगन से धीरे - धीरे कि डारो रंग - अबीरा, करो किच किच हीरा तुम्हारे सम्मुख माया है..... जोगी जी फागुन आया है -जोगीरा सर .... ‘‘

अचानक रंग में भंग हुआ धरिछन पाण्ड़े का पी.. गंगा प्रसाद को सम्मुख पाकर चुप्प हो गयी मण्डली चुप्पी तोड़ते हुए धनेसर ने पूछा - ‘‘अरे पी.. साहब आप ! कइसे याद गयी हमरी बस्ती की ?‘‘ ‘‘जब ही गए हो भईया, तो आओ, बइठो, गटक लेओ थोड़ी ठंडई तुम भी .... झींगना ने कहा।‘‘

‘‘नही झीगना, बस्! एम.एल.. साहब ने भेजा है ‘‘

‘‘होरी की दावत लेके आएं है का ?‘‘

‘‘नहीं, दूसरे काम से ‘‘

‘‘दूसरे काम से !‘‘ चौंक गया झींगना एकबारगी, फिर स्वयं को सहज करते हुए बोला -‘‘हां,कहिए कवन काम पड़ गया हमसे अचानक एम एल साइब को ?‘‘

‘‘क्यूं तुमसे काम नहीं पड़ सकता एम एल साहब को ?‘‘ पी ने झल्लाते हुए कहा ‘‘हमरा मतलब है कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली ..... खैर छोड़िए, बताईए का बात है ?‘‘

‘‘दरअसल, कोठी के सामने कुत्ता मर गया है, तुरंत हटाना है वहां से, मंत्री जी ने कहा है ‘‘

‘‘आज हम नहीं आएंगे वहां होरी का मजा किरकिरा हो जाएगा, कह देना मंत्रीजी को काल्ह सवेरे आएंगे हम ‘‘

"मंत्रीजीका आदेश है झींगना, जो करना है आज ही ..... ‘‘

आदेश शब्द सुनते ही गुस्सा गया झींगना को, बोला -‘‘हम उनके रईयत में बसे हैं का ? जब देखो तब आदेश, हम नहीं मानते पाखण्डियों के आदेश - बादेश, हां ’’

तभी किसी अनहोनी की आशंका को भांपते हुए धनेसर ने झींगना को झकझोरा -‘‘राम - राम, कीड़े पड़े मुंह में, ऐसा नहीं कहते झींगना भइया ! पण्डित हंए, उनके परतर हम नाहीं कर सकत र्हइं तोहके नशा चढ़ गया है का .....?‘‘

‘‘ बताओ धनेसर हमनी के आपन कवनो जिनगी नहीं हए का रे ! जब देखो धौंस दिखातें हए राजा भोज की औलाद ‘‘

‘‘का करोगे भइया, हम नीच कूल में जनम जो लिए हएं उनका आदेश मानना हमारी मजबूरी हए ‘‘ धनेसर ने समझाते हुए कहा !

भावनाओं के प्रवाह में बहते हुए बलराज के कंधों पर सिर टिकाकर फफक पड़ा झींगना, मन ही मन बड़बड़ाते हुए -‘‘ऊपरवाले ने कइसन जिनगी दी है भइया ! गंदा ढ़ोए नीच घीऊ पिए बभना।‘‘

‘‘का करोगे झींगना इहे समाज का नियम है, इहे परम्परा, ढोना तो पड़ेगा ही।‘‘

‘‘काहे हम डोम - चमारन के कवनो वजूद नाहीं ?‘‘

‘‘कइसन वजूद, अछूत जो ठहरो ‘‘

‘‘लेकिन बलराज भइया ! परम्परा टूटेगी कइसे ?‘‘

‘‘अब एतना जल्दी तो नहीं टूटेगी झींगना !‘‘

‘‘काहे बलराज भइया ?‘‘

‘‘तू तो जनबे करते हो झीगंना, ऊंच जात के रसूख वाले लोग हम गरीबन के सूद पर पइसा दे दे के बिगार दिए हैं -- जब तक सूद वसूलेंगे, हम बने रहेंगे उनके बुंधुआ मजदूर -- ‘‘

‘‘मगर हम तोड़ेंगे जरूर परम्परा ........ गांव वाले को निकालेंगे नरक से बाहर और बाभन भूंइहारन के गुलामी से भी ..... ’’

’’मगर कइसे ?’’

’’आंदोलन करेंगे हम -- समझाएंगे विरादरी के लोगों को और एक दिन शिव जी के धनुक की मानिन्द तोड़ देंगे यह परम्परा ..... झींगना का वादा है - ‘‘

‘‘ठीक कह रहे हो झींगना जिस दिन हम अंजाम की परवाह करना छोड़ देंगे से परंपरा टूट जाएगी ‘‘

तभी दोनों की बतकही को विराम लगाते हुए बोला धनेसरा -‘‘ सब पचड़ा में पड़ला से कनबो फायदा नाहीं झींगना, पहिले गंाव मा समाजवाद लाओ फिर करना बड़ी - बड़ी बातें ......‘‘

‘‘ समाजबाद कब आई हमरे गांव मा धनेसर ?’’

’’ समाजवाद आई जरूर झींगना, लेकिन धीरे - धीरे .....

तभी धनेसर ने झिन्गना को झकझोरा -" सब बात हम बाद में भी कर सकते हैं , पाहिले झिन्गना जाओ मंत्री जी के घर, नहीं तो बखेरा हो जाएगा। होरी में बिना मतलब जे हमार काम है करे में कइसन शरम ? कइसन घिन ?

‘‘ठीक कहत हओ धनेसर, आज दिन शुभ - शुभ बीत जाए यहि में सबके भलाई हए ‘‘इतना कहते हुए गहरी सोच में डूब गया झीगना उसका नशा का फुर हो गया। पांव से माथे तक फूटता रहा रह - रहकर गुस्सा वह सोचने लगा कि जइसे भी हो वह तोड़ेगा जरूर इस परम्परा को लाएगा जहर समाजवाद ताकि नीचता का जीवन जिए उसके बच्चे मंुह, विचकाते हुए उठा, कंधे पर गमछा रखते हुए बोला -‘‘ठीक हए चल धनेसरा, हो आते हएं बामन टोली से ‘‘

आगे बढ़ते हुए झींगना के मन में कुंठा और अवसाद घर बना रहा था तरह - तरह के ख्यालात मन में उमड़ - धुमड़ रहे थे वह मनही मन बड़बड़ाता हुआ आगे बढ़ता रहा, कि -‘‘वाह रे -- वाह - वाह रे बुड़बक वभना /सुवह - सवेरे मांस भकोसे /मछरी खाए चटर - चटर /दारू पीए, करे बुराई, घर में लवनी - लवना ...वाह रे -- वाह - वाह रे बुड़बक वभना ‘‘

..... क्रमश:....3

0 टिप्पणियाँ:

टिप्पणी पोस्ट करें

 
Top